Friday, April 15, 2022

उसने जाना

 उसने जाना

घर की सांकल खटखटाती

दुकानों की मंशा को


उसने पहचाना

पैकेटों-ठण्डी बोतलों में बंद

ज़हरीली गंध को


समझा उसने

सिक्कों की खनखनाहट में छिपे

ध्वनि- संकेतों को


आखिर भॉंप ही लिया उसने

चकाचौंध कर देने वाली

रोशनियों का मर्म


लेकिन....

तब तक वह

बूढ़ा हो चला था

सड़क

 तेवर (संपादक: कमल नयन पाण्डेय) में वर्ष 2004 में प्रकाशित एक कविता

==============

*****

यह सड़क सबकी है

साइकिल पर बल्टा लटकाए दूध वालों की

मिचमिची आँखों पर ऐनक चढ़ाए

स्कूटर पर टंगे

दफ़्तर जाते हुए बाबुओं की

पीठ पर क़िताबों का बस्ता लादे

पानी की बोतल टाँगे

रंग-बिरंगी यूनीफ़ार्म में स्कूल जाते हुए

हँसते-खिलखिलाते बच्चों की

घर-बार गिरवी रखकर शहर के बड़े डॉक्टर के पास

या मुकदमे की तारीख़ पर जा रहे

गाँव कस्बों के अनगिनत लोंगों की


यूँ तो यह सड़क

आवारा जानवरों

हाथ पसारे अधनंगे भिखरियों तक की है


कल इसी सड़क पर

बेंतों की मार से लहूलुहान

पड़ा था एक गँवार दूधवाला


उसे नहीं पता

यह सड़क किसी की नहीं होती

जब ?

जब इस पर बाँस-बल्लियाँ सजती हैं

जब इस पर सायरन और सीटियाँ बजती हैं

जब इस पर लाल नीली बत्तियाँ दौड़ती हैं

एयरपोर्ट से सर्किट हाउस तक.

                ----- चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव

Sunday, September 15, 2013

तमाशबीन


 
जो तमाशबीन हैं 
बन जायेंगे कल वे भी तमाशे का हिस्सा 
क्रूर समय के इशारों पर 
उछलेंगे, कूदेंगे, नाचेंगे 
हसेंगे, गायेंगे, रोयेंगे 
जमूरे की तरह 
....................
लोग तालियाँ पीटेंगे , ठहाके लगायेंगे 
इस बात से बेखबर कि
उन्हें भी नचाएगा मदारी समय 
कल जमूरा बनाकर 
.......................
समय की आँख में 
कैद हो चुकी है 
मज़मे में शामिल हर तमाशबीन की तस्वीर 
समय किसी को नहीं बख्शेगा 
......................................
इसलिए मेहरबान कदरदान 
होशियार हो जाओ 
कल तुम्हारी बारी है .

Saturday, January 5, 2013

मुट्‌ठी भर बीज

मुट्ठी भर बीज से
करनी है मुझे
हरी भरी समूची पृथ्वी
गिनो मत इन बीजों को
मत हँसो इन पर
सिर्फ प्रदक्षिणा करो
दे सको तो दो मुझे
उस जमीन में से गज भर जमीन
जिस पर तुम खड़े हो
अपने हिस्से की धूप में से एक टुकड़ा धूप
अंजुलि भर पानी
फिर देखना
तुम्हारे देखते ही देखते
मैं उगाउँगा कुछ पेड़
कुछ फूल कुछ फल
कुछ खुशबू कुछ छाया
फलों से निकलेंगे कुछ और बीज
फिर होंगी कुछ और मुटि्ठयां बीजों से भरी
रंग उठेगी पृथ्वी एक दिन जरूर
हरे रंग से
----

सर्दी

बाहर बहुत सर्दी है 

शायद इसीलिए 

लोग सिमटे हैं अपने अपने लिहाफों में

सर्दी

कहते हैं - सर्दियों में हर चीज सिकुड़ जाती है 

सिकुड़ रही है हमारी मानसिकता 

आदमी की आदमीयत

Friday, January 4, 2013

कहीं न कहीं मौजूद है कविता

कहीं कहीं मौजूद है कविता

नींद में सोया हुआ बच्चा
इंद्रधनुषी सपने देख जब मुस्कुराता है
महक उठती है मेरी कविता
सिनेमाहॉल में
खलनायक की पिटाई पर
जब गूँजती है तालियों की गड़गड़ाहट
चहक उठती है मेरी कविता
किसी हत्यारे को
फांसी की सजा मिलने पर
झलकता है एक सन्तोष
मेरी पत्नी के चेहरे पर
तब
आश्वस् होती है कविता
अपनी मौजूदगी के प्रति
यह कि
कहीं कहीं तो वह है जरूर