Friday, January 4, 2013

कहीं न कहीं मौजूद है कविता

कहीं कहीं मौजूद है कविता

नींद में सोया हुआ बच्चा
इंद्रधनुषी सपने देख जब मुस्कुराता है
महक उठती है मेरी कविता
सिनेमाहॉल में
खलनायक की पिटाई पर
जब गूँजती है तालियों की गड़गड़ाहट
चहक उठती है मेरी कविता
किसी हत्यारे को
फांसी की सजा मिलने पर
झलकता है एक सन्तोष
मेरी पत्नी के चेहरे पर
तब
आश्वस् होती है कविता
अपनी मौजूदगी के प्रति
यह कि
कहीं कहीं तो वह है जरूर

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