Saturday, January 5, 2013

मुट्‌ठी भर बीज

मुट्ठी भर बीज से
करनी है मुझे
हरी भरी समूची पृथ्वी
गिनो मत इन बीजों को
मत हँसो इन पर
सिर्फ प्रदक्षिणा करो
दे सको तो दो मुझे
उस जमीन में से गज भर जमीन
जिस पर तुम खड़े हो
अपने हिस्से की धूप में से एक टुकड़ा धूप
अंजुलि भर पानी
फिर देखना
तुम्हारे देखते ही देखते
मैं उगाउँगा कुछ पेड़
कुछ फूल कुछ फल
कुछ खुशबू कुछ छाया
फलों से निकलेंगे कुछ और बीज
फिर होंगी कुछ और मुटि्ठयां बीजों से भरी
रंग उठेगी पृथ्वी एक दिन जरूर
हरे रंग से
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सर्दी

बाहर बहुत सर्दी है 

शायद इसीलिए 

लोग सिमटे हैं अपने अपने लिहाफों में

सर्दी

कहते हैं - सर्दियों में हर चीज सिकुड़ जाती है 

सिकुड़ रही है हमारी मानसिकता 

आदमी की आदमीयत

Friday, January 4, 2013

कहीं न कहीं मौजूद है कविता

कहीं कहीं मौजूद है कविता

नींद में सोया हुआ बच्चा
इंद्रधनुषी सपने देख जब मुस्कुराता है
महक उठती है मेरी कविता
सिनेमाहॉल में
खलनायक की पिटाई पर
जब गूँजती है तालियों की गड़गड़ाहट
चहक उठती है मेरी कविता
किसी हत्यारे को
फांसी की सजा मिलने पर
झलकता है एक सन्तोष
मेरी पत्नी के चेहरे पर
तब
आश्वस् होती है कविता
अपनी मौजूदगी के प्रति
यह कि
कहीं कहीं तो वह है जरूर