मुट्ठी भर बीज से
करनी है मुझे
हरी भरी समूची पृथ्वी
गिनो मत इन बीजों को
मत हँसो इन पर
सिर्फ प्रदक्षिणा करो
दे सको तो दो मुझे
उस जमीन में से गज भर जमीन
जिस पर तुम खड़े हो
अपने हिस्से की धूप में से एक टुकड़ा धूप
अंजुलि भर पानी
फिर देखना
तुम्हारे देखते ही देखते
मैं उगाउँगा कुछ पेड़
कुछ फूल कुछ फल
कुछ खुशबू कुछ छाया
फलों से निकलेंगे कुछ और बीज
फिर होंगी कुछ और मुटि्ठयां बीजों से भरी
रंग उठेगी पृथ्वी एक दिन जरूर
हरे रंग से
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चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव